Psalms 130
A penitential psalm crying from the depths for mercy.
Psalm 130 begins with one of the Psalter's most quoted lines, "out of the depths have I cried unto thee, O LORD," as the writer asks who could stand if God marked every iniquity. Its urgent tone contrasts with the harsher plea against enemies in Psalms 129.
हे यहोवा, मैंने गहरे स्थानों में से तुझको पुकारा है!
हे प्रभु, मेरी सुन! तेरे कान मेरे गिड़गिड़ाने की ओर ध्यान से लगे रहें!
हे यहोवा, यदि तू अधर्म के कामों का लेखा ले, तो हे प्रभु कौन खड़ा रह सकेगा?
परन्तु तू क्षमा करनेवाला है, जिससे तेरा भय माना जाए।
मैं यहोवा की बाट जोहता हूँ, मैं जी से उसकी बाट जोहता हूँ, और मेरी आशा उसके वचन पर है;
पहरुए जितना भोर को चाहते हैं, हाँ, पहरुए जितना भोर को चाहते हैं, उससे भी अधिक मैं यहोवा को अपने प्राणों से चाहता हूँ।
इस्राएल, यहोवा पर आशा लगाए रहे! क्योंकि यहोवा करुणा करनेवाला और पूरा छुटकारा देनेवाला है।
इस्राएल को उसके सारे अधर्म के कामों से वही छुटकारा देगा।