Psalms 129
A psalm of survival against long affliction and hatred.
Psalm 129 opens with Israel recalling a history of suffering, "many a time have they afflicted me from my youth," yet insisting the enemy "have not prevailed." It offers a harder-edged companion to the blessing pronounced in Psalms 128, this time framed as survival rather than prosperity.
इस्राएल अब यह कहे, “मेरे बचपन से लोग मुझे बार बार क्लेश देते आए हैं,
मेरे बचपन से वे मुझ को बार बार क्लेश देते तो आए हैं, परन्तु मुझ पर प्रबल नहीं हुए।
हलवाहों ने मेरी पीठ के ऊपर हल चलाया, और लम्बी-लम्बी रेखाएँ की।”
यहोवा धर्मी है; उसने दुष्टों के फंदों को काट डाला है;
जितने सिय्योन से बैर रखते हैं, वे सब लज्जित हों, और पराजित होकर पीछे हट जाए!
वे छत पर की घास के समान हों, जो बढ़ने से पहले सूख जाती है;
जिससे कोई लवनेवाला अपनी मुट्ठी नहीं भरता, न पूलियों का कोई बाँधनेवाला अपनी अँकवार भर पाता है,
और न आने-जानेवाले यह कहते हैं, “यहोवा की आशीष तुम पर होवे! हम तुम को यहोवा के नाम से आशीर्वाद देते हैं!”