Psalms 13: From Anguish to Trust
Four repeated 'how longs' resolved into a song of joy.
One of the shortest laments in the Psalter, this chapter follows Psalms 12 and opens with David repeating 'how long' four times as he wrestles with sorrow, a hidden God, and a triumphant enemy. He asks to be enlightened before he sleeps the sleep of death.
हे परमेश्वर, तू कब तक? क्या सदैव मुझे भूला रहेगा? तू कब तक अपना मुखड़ा मुझसे छिपाए रखेगा?
मैं कब तक अपने मन ही मन में युक्तियाँ करता रहूँ, और दिन भर अपने हृदय में दुःखित रहा करूँ?, कब तक मेरा शत्रु मुझ पर प्रबल रहेगा?
हे मेरे परमेश्वर यहोवा, मेरी ओर ध्यान दे और मुझे उत्तर दे, मेरी आँखों में ज्योति आने दे, नहीं तो मुझे मृत्यु की नींद आ जाएगी;
ऐसा न हो कि मेरा शत्रु कहे, “मैं उस पर प्रबल हो गया;” और ऐसा न हो कि जब मैं डगमगाने लगूँ तो मेरे शत्रु मगन हों।
परन्तु मैंने तो तेरी करुणा पर भरोसा रखा है; मेरा हृदय तेरे उद्धार से मगन होगा।
मैं यहोवा के नाम का भजन गाऊँगा, क्योंकि उसने मेरी भलाई की है।