Psalm 85 - A Prayer for Revival and Restored Mercy
Mercy and truth meet together in this prayer for national revival.
Psalm 85 begins by remembering how the LORD once forgave Israel's iniquity and turned back His anger, then turns that memory into a fresh plea: 'Wilt thou not revive us again?' It stands within the Psalms overview as a bridge between past mercy and present need.
हे यहोवा, तू अपने देश पर प्रसन्न हुआ, याकूब को बँधुवाई से लौटा ले आया है।
तूने अपनी प्रजा के अधर्म को क्षमा किया है; और उसके सब पापों को ढाँप दिया है। (सेला)
तूने अपने रोष को शान्त किया है; और अपने भड़के हुए कोप को दूर किया है।
हे हमारे उद्धारकर्ता परमेश्वर, हमको पुनः स्थापित कर, और अपना क्रोध हम पर से दूर कर!
क्या तू हम पर सदा कोपित रहेगा? क्या तू पीढ़ी से पीढ़ी तक कोप करता रहेगा?
क्या तू हमको फिर न जिलाएगा, कि तेरी प्रजा तुझ में आनन्द करे?
हे यहोवा अपनी करुणा हमें दिखा, और तू हमारा उद्धार कर।
मैं कान लगाए रहूँगा कि परमेश्वर यहोवा क्या कहता है, वह तो अपनी प्रजा से जो उसके भक्त है, शान्ति की बातें कहेगा; परन्तु वे फिरके मूर्खता न करने लगें।
निश्चय उसके डरवैयों के उद्धार का समय निकट है, तब हमारे देश में महिमा का निवास होगा।
करुणा और सच्चाई आपस में मिल गई हैं; धर्म और मेल ने आपस में चुम्बन किया हैं।
पृथ्वी में से सच्चाई उगती और स्वर्ग से धर्म झुकता है।
हाँ, यहोवा उत्तम वस्तुएँ देगा, और हमारी भूमि अपनी उपज देगी।
धर्म उसके आगे-आगे चलेगा, और उसके पाँवों के चिन्हों को हमारे लिये मार्ग बनाएगा।