Psalm 52: Like a Green Olive Tree in God's House

A rebuke of a deceitful tongue contrasted with quiet trust in God's mercy.

Psalm 52 - Like a Green Olive Tree

Psalm 52 confronts a 'mighty man' who boasts in mischief and loves lying words more than righteousness, a sharp contrast to David's own confession in Psalms 51. The tongue is compared to 'a sharp razor, working deceitfully.'


हे वीर, तू बुराई करने पर क्यों घमण्ड करता है? परमेश्वर की करुणा तो अनन्त है।

तेरी जीभ केवल दुष्टता गढ़ती है; सान धरे हुए उस्तरे के समान वह छल का काम करती है।

तू भलाई से बढ़कर बुराई में, और धार्मिकता की बात से बढ़कर झूठ से प्रीति रखता है। (सेला)

हे छली जीभ, तू सब विनाश करनेवाली बातों से प्रसन्न रहती है।

निश्चय परमेश्वर तुझे सदा के लिये नाश कर देगा; वह तुझे पकड़कर तेरे डेरे से निकाल देगा; और जीवितों के लोक से तुझे उखाड़ डालेगा। (सेला)

तब धर्मी लोग इस घटना को देखकर डर जाएँगे, और यह कहकर उस पर हँसेंगे,

“देखो, यह वही पुरुष है जिसने परमेश्वर को अपनी शरण नहीं माना, परन्तु अपने धन की बहुतायत पर भरोसा रखता था, और अपने को दुष्टता में दृढ़ करता रहा!”

परन्तु मैं तो परमेश्वर के भवन में हरे जैतून के वृक्ष के समान हूँ। मैंने परमेश्वर की करुणा पर सदा सर्वदा के लिये भरोसा रखा है।

मैं तेरा धन्यवाद सर्वदा करता रहूँगा, क्योंकि तू ही ने यह काम किया है। मैं तेरे नाम पर आशा रखता हूँ, क्योंकि यह तेरे पवित्र भक्तों के सामने उत्तम है।

God is said to root the deceiver out of the land of the living, while the psalmist declares himself 'like a green olive tree in the house of God,' a fruitful image paralleled at <a href="/bible/irvhin/psalms/chapter-92/12">Psalms 92:12-14</a>. The psalm closes waiting on God's name before the bleak assessment of <a href="/bible/irvhin/psalms/chapter-53">Psalms 53</a>.