Psalms 11: Trusting God Instead of Fleeing
David refuses to flee, choosing trust over panic.
Short and defiant, this chapter follows the lament of Psalms 10 as David rejects counsel to flee like a bird to the mountains when the wicked bend their bow against him. He anchors his confidence in the LORD's holy temple and heavenly throne.
मैं यहोवा में शरण लेता हूँ; तुम क्यों मेरे प्राण से कहते हो “ पक्षी के समान अपने पहाड़ पर उड़ जा”;
क्योंकि देखो, दुष्ट अपना धनुष चढ़ाते हैं, और अपने तीर धनुष की डोरी पर रखते हैं, कि सीधे मनवालों पर अंधियारे में तीर चलाएँ।
यदि नींवें ढा दी जाएँ तो धर्मी क्या कर सकता है?
यहोवा अपने पवित्र भवन में है; यहोवा का सिंहासन स्वर्ग में है; उसकी आँखें मनुष्य की सन्तान को नित देखती रहती हैं और उसकी पलकें उनको जाँचती हैं।
यहोवा धर्मी और दुष्ट दोनों को परखता है, परन्तु जो उपद्रव से प्रीति रखते हैं उनसे वह घृणा करता है।
वह दुष्टों पर आग और गन्धक बरसाएगा; और प्रचण्ड लूह उनके कटोरों में बाँट दी जाएँगी।
क्योंकि यहोवा धर्मी है, वह धार्मिकता के ही कामों से प्रसन्न रहता है; धर्मी जन उसका दर्शन पाएँगे।