Matthew Chapter 23

Jesus denounces religious hypocrisy in a series of woes, then mourns over Jerusalem.

Matthew 23 turns sharply as Jesus warns the crowds and His disciples about the scribes and Pharisees who 'say, and do not,' loving honor and titles while binding heavy burdens on others. This rebuke follows His public debates in Matthew 22 and builds toward a series of pointed 'woes.'


तब यीशु ने भीड़ से और अपने चेलों से कहा,

‹“शास्त्री और फरीसी मूसा की गद्दी पर बैठे हैं;›

‹इसलिए वे तुम से जो कुछ कहें वह करना, और मानना, परन्तु उनके जैसा काम मत करना; क्योंकि वे कहते तो हैं पर करते नहीं।›

‹वे एक ऐसे› ‹भारी बोझ को जिनको उठाना कठिन है, बाँधकर उन्हें मनुष्यों के कंधों पर रखते हैं;›‹परन्तु आप उन्हें अपनी उँगली से भी सरकाना नहीं चाहते।›

‹वे अपने सब काम लोगों को दिखाने के लिये करते हैं वे अपने› ‹तावीजों›‹को चौड़े करते, और अपने वस्त्रों की झालरों को बढ़ाते हैं।›

‹भोज में मुख्य-मुख्य जगहें, और आराधनालयों में मुख्य-मुख्य आसन,›

‹और बाजारों में नमस्कार और मनुष्य में रब्बी कहलाना उन्हें भाता है।›

‹परन्तु तुम रब्बी न कहलाना, क्योंकि तुम्हारा एक ही गुरु है: और तुम सब भाई हो।›

‹और पृथ्वी पर किसी को अपना पिता न कहना, क्योंकि तुम्हारा एक ही पिता है, जो स्वर्ग में है।›

‹और स्वामी भी न कहलाना, क्योंकि तुम्हारा एक ही स्वामी है, अर्थात् मसीह।›

‹जो तुम में बड़ा हो, वह तुम्हारा सेवक बने।›

‹जो कोई अपने आपको बड़ा बनाएगा, वह छोटा किया जाएगा: और जो कोई अपने आपको छोटा बनाएगा, वह बड़ा किया जाएगा।›

‹“हे कपटी शास्त्रियों और फरीसियों तुम पर हाय! तुम मनुष्यों के विरोध में स्वर्ग के राज्य का द्वार बन्द करते हो, न तो आप ही उसमें प्रवेश करते हो और न उसमें प्रवेश करनेवालों को प्रवेश करने देते हो।›

‹[हे कपटी शास्त्रियों और फरीसियों, तुम पर हाय! तुम विधवाओं के घरों को खा जाते हो, और दिखाने के लिए बड़ी देर तक प्रार्थना करते रहते हो: इसलिए तुम्हें अधिक दण्ड मिलेगा।]›

‹“हे कपटी शास्त्रियों और फरीसियों तुम पर हाय! तुम एक जन को अपने मत में लाने के लिये सारे जल और थल में फिरते हो, और जब वह मत में आ जाता है, तो उसे अपने से दुगना नारकीय बना देते हो।›

‹“हे अंधे अगुओं, तुम पर हाय, जो कहते हो कि यदि कोई मन्दिर की शपथ खाए तो कुछ नहीं, परन्तु यदि कोई मन्दिर के सोने की सौगन्ध खाए तो उससे बन्ध जाएगा।›

‹हे मूर्खों, और अंधों, कौन बड़ा है, सोना या वह मन्दिर जिससे सोना पवित्र होता है?›

‹फिर कहते हो कि यदि कोई वेदी की शपथ खाए तो कुछ नहीं, परन्तु जो भेंट उस पर है, यदि कोई उसकी शपथ खाए तो बन्ध जाएगा।›

‹हे अंधों, कौन बड़ा है, भेंट या वेदी जिससे भेंट पवित्र होती है?›

‹इसलिए जो वेदी की शपथ खाता है, वह उसकी, और जो कुछ उस पर है, उसकी भी शपथ खाता है।›

‹और जो मन्दिर की शपथ खाता है, वह उसकी और उसमें रहनेवालों की भी शपथ खाता है।›

‹और जो स्वर्ग की शपथ खाता है, वह परमेश्वर के सिंहासन की और उस पर बैठनेवाले की भी शपथ खाता है।›

‹“हे कपटी शास्त्रियों, और फरीसियों, तुम पर हाय! तुम पोदीने और सौंफ और जीरे का दसवाँ अंश देते हो, परन्तु तुम ने व्यवस्था की गम्भीर बातों अर्थात् न्याय, और दया, और विश्वास को छोड़ दिया है; चाहिये था कि इन्हें भी करते रहते, और उन्हें भी न छोड़ते।›

‹हे अंधे अगुओं, तुम मच्छर को तो छान डालते हो, परन्तु ऊँट को निगल जाते हो।›

‹“हे कपटी शास्त्रियों, और फरीसियों, तुम पर हाय! तुम कटोरे और थाली को ऊपर-ऊपर से तो माँजते हो परन्तु वे भीतर अंधेर असंयम से भरे हुए हैं।›

‹हे अंधे फरीसी, पहले कटोरे और थाली को› ‹भीतर से माँज कि वे बाहर से भी स्वच्छ हों।›

‹“हे कपटी शास्त्रियों, और फरीसियों, तुम पर हाय! तुम› ‹चूना फिरी हुई कब्रों›‹के समान हो जो ऊपर से तो सुन्दर दिखाई देती हैं, परन्तु भीतर मुर्दों की हड्डियों और सब प्रकार की मलिनता से भरी हैं।›

‹इसी रीति से तुम भी ऊपर से मनुष्यों को धर्मी दिखाई देते हो, परन्तु भीतर कपट और अधर्म से भरे हुए हो।›

‹“हे कपटी शास्त्रियों, और फरीसियों, तुम पर हाय! तुम भविष्यद्वक्ताओं की कब्रें संवारते और धर्मियों की कब्रें बनाते हो।›

‹और कहते हो, ‘यदि हम अपने पूर्वजों के दिनों में होते तो भविष्यद्वक्ताओं की हत्या में उनके सहभागी न होते।’›

‹इससे तो तुम अपने पर आप ही गवाही देते हो, कि तुम भविष्यद्वक्ताओं के हत्यारों की सन्तान हो।›

‹अतः तुम अपने पूर्वजों के पाप का घड़ा भर दो।›

‹हे साँपों, हे करैतों के बच्चों, तुम नरक के दण्ड से कैसे बचोगे?›

‹इसलिए देखो, मैं तुम्हारे पास भविष्यद्वक्ताओं और बुद्धिमानों और शास्त्रियों को भेजता हूँ; और तुम उनमें से कुछ को मार डालोगे, और क्रूस पर चढ़ाओगे; और कुछ को अपने आराधनालयों में कोड़े मारोगे, और एक नगर से दूसरे नगर में खदेड़ते फिरोगे।›

‹जिससे धर्मी हाबिल से लेकर बिरिक्याह के पुत्र जकर्याह तक, जिसे तुम ने मन्दिर और वेदी के बीच में मार डाला था, जितने धर्मियों का लहू पृथ्वी पर बहाया गया है, वह सब तुम्हारे सिर पर पड़ेगा।›

‹मैं तुम से सच कहता हूँ, ये सब बातें इस पीढ़ी के लोगों पर आ पड़ेंगी।›

‹“हे यरूशलेम, हे यरूशलेम! तू जो भविष्यद्वक्ताओं को मार डालता है, और जो तेरे पास भेजे गए, उन्हें पथराव करता है, कितनी ही बार मैंने चाहा कि जैसे मुर्गी अपने बच्चों को अपने पंखों के नीचे इकट्ठा करती है, वैसे ही मैं भी तेरे बालकों को इकट्ठा कर लूँ, परन्तु तुम ने न चाहा।›

‹देखो, तुम्हारा घर तुम्हारे लिये उजाड़ छोड़ा जाता है।›

‹क्योंकि मैं तुम से कहता हूँ, कि अब से जब तक तुम न कहोगे, ‘धन्य है वह, जो प्रभु के नाम से आता है’ तब तक तुम मुझे फिर कभी न देखोगे।”›

Jesus pronounces seven woes against the Pharisees, calling them 'whited sepulchres' and 'blind guides,' echoing His earlier complaint that they honor God 'with their lips' while their heart is far away, as also read in <a href="/bible/irvhin/luke/chapter-11/42">Luke 11:42</a>. The chapter ends with His lament over Jerusalem before the Olivet discourse begins in <a href="/bible/irvhin/matthew/chapter-24">Matthew 24</a>.